शोरो (संगीत) असल में कहाँ से है?
शोरो रियो डी जनेरियो से आया है, जहाँ यह 19वीं सदी में स्थानीय संगीतकारों के आयातित नृत्य-संगीत बजाने के अंदाज़ से पनपा। इसे शहरी लोकप्रिय संगीत की पहली ठेठ ब्राज़ीली विधा माना जाता है; यह ज़्यादातर वाद्य संगीत है और अपने नाम के बावजूद अक्सर तेज़ और ख़ुशमिज़ाज होता है।
बजाने का एक अंदाज़
19वीं सदी में रियो के बॉलरूम यूरोपीय सैलून नृत्यों पर थिरकते थे, ख़ासकर पोल्का पर, जो 1844 से ब्राज़ील में लोकप्रिय था, और साथ में शॉटिश और मज़ुर्का पर। शहर के लोकप्रिय संगीतकार, जो लुंडू जैसी अफ़्रो-ब्राज़ीली तालों में रचे-बसे थे, इन धुनों को सिंकोपेटेड, दर्द भरे अंदाज़ में बजाते थे। इतिहासकार जोसे रामोस तिन्योराओ के अनुसार शोरो लगभग 1870 में पहली बार किसी विधा के रूप में नहीं, बल्कि ‘बजाने के एक अंदाज़’ के रूप में सामने आया। बाद में जाकर यह शब्द ख़ुद इस संगीत का नाम बना।
कलादो की ‘Choro Carioca’
सबसे पुराने विवरण बाँसुरी-वादक जोआकिंग कलादो को, जो इंपीरियल कंज़र्वेटरी में बाँसुरी सिखाते थे, पहली मंडलियों का आयोजक बताते हैं। 1870 के दशक में उन्होंने ‘Choro Carioca’ नाम की मंडली चलाई, जिसमें बाँसुरी, दो गिटार और cavaquinho था, जो चार तारों वाला एक छोटा वाद्य है। शुरुआती chorões में से बहुत-से डाक, तार और रेलवे विभागों के मामूली क्लर्क थे, जो पार्टियों, बारों और घरेलू नाच-महफ़िलों में बजाते थे। पियानो-वादकों शिकिन्या गोंज़ागा और एर्नेस्तो नाज़ारेथ ने इसका बहुत-सा संगीत रचा, और 1910 के दशक तक ब्राज़ील के बहुत-से पहले रिकॉर्ड शोरो के थे।
पिशिंगिन्या और roda
बाँसुरी और सैक्सोफ़ोन वादक पिशिंगिन्या इस विधा के सबसे बड़े रचनाकार बने; उनकी ‘Carinhoso’ को बाद में बोल मिले और यह हिट हुई। 1930 और 1940 के दशकों में रेडियो ने शोरो को दूर-दूर तक पहुँचाया। जब 1950 और 1960 के दशकों में शहरी साम्बा रेडियो पर छा गया, तब शोरो rodas de choro में ज़िंदा रहा, यानी घरों और बारों की अनौपचारिक बैठकों में। ब्राज़ील 23 अप्रैल को, पिशिंगिन्या के जन्मदिन पर, राष्ट्रीय शोरो दिवस मनाता है, और फ़रवरी 2024 में देश की विरासत संस्था Iphan ने शोरो को देश की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा माना।
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