पोर्सिलेन असल में कहाँ से है?
पोर्सिलेन चीन से आया है, जहाँ कुम्हारों ने सदियों तक एक सख़्त, सफ़ेद सिरेमिक को निखारा जिसमें से रोशनी झलकती है। 18वीं सदी की शुरुआत तक यूरोप इसे सिर्फ़ आयात कर सकता था, सहेज सकता था और इसकी नक़ल की कोशिश कर सकता था, इसीलिए अंग्रेज़ी आज भी इसे china कहती है।
चीनी भट्टियों में सदियाँ
पोर्सिलेन ऐसे कच्चे माल से बनता है जिसमें आम तौर पर केओलिन मिट्टी होती है, और इसे 1,200 से 1,400 °C पर पकाया जाता है; यही ताप इसे मज़बूत और पारभासी बनाता है। चीनी कुम्हार क़दम-दर-क़दम यहाँ तक पहुँचे। शुरुआती ‘प्रोटो-पोर्सिलेन’ शांग राजवंश (1600–1046 ईसा पूर्व) तक जाता है। पूर्वी हान राजवंश (25–220 ईस्वी) तक ग्लेज़ वाले बर्तन ऊँचे ताप पर पके पोर्सिलेन बन चुके थे, और सुई राजवंश के आख़िर और तांग राजवंश की शुरुआत तक कुम्हारों ने वह सफ़ेदी और पारभासिता पा ली थी जिसकी आज अपेक्षा की जाती है। परिभाषा के हिसाब से, यह तकनीक लगभग 200 से 800 ईस्वी के बीच परिपक्व हुई।
व्यापार का ख़ज़ाना
तांग काल में ही चीनी पोर्सिलेन इस्लामी दुनिया को निर्यात होने लगा था, जहाँ इसकी बहुत क़द्र थी। सोंग राजवंश (960–1279) तक ‘ड्रैगन भट्टियाँ’ एक बार में 25,000 तक बर्तन पका सकती थीं। मिंग राजवंश (1368–1644) के दौरान मशहूर नीले-सफ़ेद बर्तनों जैसी चीज़ें एशिया, अफ़्रीका और यूरोप पहुँचीं, और 1517 में पुर्तगाली व्यापारी समुद्र के रास्ते चीन से सीधा व्यापार करने लगे। पोर्सिलेन का ज़िक्र करने वाले पहले यूरोपीय मार्को पोलो थे, 13वीं सदी में।
यूरोप ने राज़ खोला
सदियों तक यूरोपीय कुम्हार बस नक़लें बनाते रहे, जैसे सॉफ़्ट-पेस्ट बर्तन, जो असली पोर्सिलेन नहीं थे। कामयाबी जर्मनी में मिली: एक कार्यशाला का नोट 1708 में पहले सख़्त, सफ़ेद यूरोपीय पोर्सिलेन को दर्ज करता है, जो एहरनफ़्रीड वाल्टर फ़ॉन चिर्नहाउस की देखरेख में बना। उसी साल उनकी मृत्यु हो गई, और 1709 में उनके सहायक योहान फ़्रीड्रिख़ बॉटगर ने, जो दवासाज़ से कीमियागर बने थे, इस कामयाबी की सूचना दी। माइसेन कारख़ाना 1710 में खुला। अंग्रेज़ी 1650 के दशक तक ही इस बर्तन को china नाम दे चुकी थी, जो China-ware का छोटा रूप है।
स्रोत: en.wikipedia.org ↗ · etymonline.com › porcelain ↗ · etymonline.com › china ↗